मैं अक्सर तंहा नहीं रहता…
क्यूँकि तब मैं ख़ुद के साथ होता हूँ…
और कोई ख़ुद से झूठ कैसे बोले ?

मैं आइने में चेहरा देखता हूँ…
ज़ुल्फ़ें सँवारता हूँ… पर नज़रें नहीं मिलाता..
कि ख़ुद से सवालों की गठरी कौन खोले ?

मैं ज़िंदादिली ओढ़ लेता हूँ..
रात भर रोंधे गले की ख़राश कि बाद..
किसी को मेरी बुज़दिली का अहसास क्यूँ होले ?

ज़रूरी नहीं के ख़ुद पर हो गुज़री…
ठिठुरती रात में सड़क पर जागते नंगे बदन…
वो इंसान नहीं जो ये देख चैन से सोले !

मैं दोस्त कम कर लेता हूँ…
जब खलने लगती हे कमी उनकी…
भला मरने पर एक और आँख क्यूँ रोले ?