क्यूँ कुछ भुला कुछ याद रहा..
इसलिए स्वयं से संवाद किया..
भूले बिसरे पल-छिन फिर सोच..
कुछ हर्ष किया कुछ विषाद किया ।

आज अगर कुछ बोलूँ तो..
लोगों के दंभ पर तीर चले..
कुछ वर्ष बाद फिर सोचूँगा..
क्यूँ वर्षों को बर्बाद किया ।

संवेदनाएँ सिक्कों में तुलती..
भावनाएँ तीव्र रुदन करती..
हमने भी कलि के इस युग का..
प्रसाद लिया व अवसाद किया ।

“दिनकर” के छंद “दुष्यंत” की ग़ज़ल..
आज खड़े सड़क पर हो रहे विकल..
ना तो वो “सूरत” बदल सकी..
क्यूँ “रश्मिरथी” शंख-नाद किया ।