आज भी सितम ढाओगे जब गुजरूँगा तुम्हारी शामों से…
या फिर इन कुछ महीनो में हल्की सी नियत बदल गई !

आज भी सुबह हँसती है और रात ज़ुल्फ़ सी गहरी है..
या फिर इन कुछ महीनो में तल्ख़ी सी सूरत बदल गई !

आज भी रात दिवाली पर मिट्टी के दिए जलते हैं..
या फिर इन कुछ महीनो में तेरी ज़रूरत बदल गई !

आज भी मंदिर-मंज़िरो में अज़ान कि मिश्री घुलती है..
या फिर इन कुछ महीनो में इंसान की मूरत बदल गई !

आज भी उन गुलमोहरों पर पंछियों का डेरा लगता है..
या फिर इन कुछ महीनो में जंगल की सीरत बदल गई !

सनम बेवफ़ा हो जाए पर मेरा शहर बेवफ़ा नही होता..
या फिर इन कुछ महीनो में इसकी भी हुकूमत बदल गई !