रात्रि की सुगंध में निद्रा विलीन हो गई…
विचलित सिंधु की लहर शालीन हो गई…
पर अक्षु बंद होते नहीं, बस ताकते हैं शून्य में…
झाँकते हैं पापों की गठरी में छुपे पुण्य में…
आहत है संवेदना, चोट बड़ी विचित्र है…
मित्र से मिलने को भी भयभीत मित्र है…
दोष देना ही पड़ेगा मेरी चयन की नीति को…
जीवन भर की मान बैठा, एक ऋतु की प्रीति को…
पर अब स्वस्थ हूँ, इन विचारों से समाप्त हूँ…
नव बेला में जीवित हूँ, स्वयं में पर्याप्त हूँ…
कभी भविष्य में मिले तुम, प्रत्यक्ष कहूँगा मित्र ही..
परोक्ष में खींचा रहेगा, इस खिन्न रात्रि का चित्र ही… !!!