हाँ गाड़ दिए हैं मैंने कुछ लम्हें मिट्टी में..
अब कुछ सालों में यादों की फ़सल उगेगी..
तुम गवाही देना कितना व्यथित था कूदाल चलते वक़्त…
जब हँसिया चलते समय हँसी छूटेगी ।

अभी तो ताज़े ताज़े हैं ये लम्हें..
आँसुओं से सीझें हुए.. ज़ख़्मों की खाद से ढके..
पड़ने दो इन पर सूरज की रोशनी दिन-प्रतिदिन..
के कुछ महीनों में ही कोपलें फूटेगी ।

ज़रूरी है पल-पल की फ़सल बोना..
की बंजर ना हो जाए कहीं यादों की ज़मीन..
अकेले में.. खाट पर लेट आसमान में ताकने से अच्छा है..
लहलहाते खेत देखें जब तक साँस टूटेगी ।