तुम्हें कुछ ग़ौर से देखा तो पाया..
के मेरी एक आरज़ू सी हो तुम..
जिसे चाह कर भूल गया था ये कह के..
“कि ये भी भला कभी पूरी होती हे !”

ठहरो ज़रा भाप तो फेंकू ऐनक पे..
और फिर सूती कपड़े से साफ़ तो करूँ ज़रा..
फिर चढ़ाऊँ आँखों पर ठीक से..
और देखूँ के मेरी याद्दाश्त कैसी हे !

हाँ ! याद आया के कब उठी थी तुम..
जोश-ऐ-जवानी शबाब पे था उन दिनों..
सड़कों पर ठहलते सोच लिया करते थे..
अगले चुनाव में सरकार किसकी हे !

उस लड़की को देखा था गली के नुक्कड़ पे..
सूरत से मासूम लगती थी और तहज़ीब से इंसान..
ख़ूबसूरती ऐसी की ना आँखें पीछा छोड़े ना क़दम..
भला इश्क़ होने को दरकार किसकी हे !

जब उसने भी इशारा किया तो जाना..
वो रमा नहीं रूखसार निकली..
लड़ लेंगे ज़माने से.. डरते हैं क्या ?
शेर-ऐ-दिल से ये आवाज़ निकली !

पर प्यार परवान चढता के हालात गंदे हो गए..
मेरे बदकिस्मत शहर में दंगे हो गए..
वो बीस दिन, हैवानियत थी मजहब कहीं नहीं..
सोचता रहा के मेरी मोहब्बत गुनहगार किसकी हे !

फिर तो ना रूखसार थी ना मोहब्बत थी..
तो बस, उसे नाम दे दिया आरज़ू का..
और उसे भुला दिया ये कह के..
“कि ये भी भला कभी पूरी होती हे !”