उनको भी क्या दोस्त कहें.. मौसम की तरह जो बदल गए..
ऋतु अगले बरस फिर आती है.. यहाँ हर साल मौसम नए मिले !

उसको भी क्या प्रेम कहें.. जो पल में होकर मिट जाता है..
मिट कर फिर हो जाता है.. किसी नए प्रीतम के लिए !

उसको भी क्या ज्ञान कहें.. जिसकी मद पर सवारी हो..
जो औछा समझे दूजे को.. ख़ुद अपना ही गुड़ ज्ञान किए !

उसको भी क्या आस कहें.. जो हर रात दिए सी बुझ जाए..
आस अटल है मृत्यु की.. जो वो जीवन के लिए जिए !

उसको भी क्या यौवन कहें.. जो खाए, पिए और सो जाए
यौवन तो तपता अग्नि में.. परिश्रम खाए और श्वेद पिए !