क्षण भर ज़रा बैठ के सोचो.. क्यूँ भाग रहे हो ?
अर्जुन बन गाण्डीव चढ़ा.. क्या साध रहे हो ?
जो पाना है वो अमुल्य है.. पर जो है उसका क्या !
नैन भौंचक्के खुले मगर क्या जाग रहे हो ?

जीवन में ऐसी भी क्या आग लगी है..
लालिमा लिए प्रत्यक्ष साँझ खड़ी है..
ऑफ़िस के परदों को भी सरका के देख..
इंद्रधनुष को कबसे रिझा बरखा की लड़ी है..

सुख गठरी में है तेरी.. किससे माँग रहे हो ?
क्षण भर ज़रा बैठ के सोचो.. क्यूँ भाग रहे हो ?

धन संपती जमा बहुत करली यौवन में..
अब ख़र्च कर रहा उसे ज़रा में औषधियों में..
सागर का विस्तार.. नदियों की रफ़्तार..
पर्वत की अट्टालिकाएँ देखना अब सुधियों में..

समय फिसलता रेत सा.. हथेली को क्या ताक रहे हो?
क्षण भर ज़रा बैठ के सोचो.. क्यूँ भाग रहे हो ?