कुछ अजीब सी बात है ज़िंदगी..
सर्दियों में भी तू कभी इतनी ठंडी ना हुई..
क्या बात है इस शाम की बता ज़रा..
या ये क़सूर है इस पुरवाई का जो चली !

इतनी सुनसान तो नहीं कभी सुना तुझे..
चेहरे पर रोज़ से ज़्यादा ही शिकन हैं खिंची..
सिलवटें बिस्तर पर नहीं, कमरा अनछुआ सा..
शब भर सोई भी नहीं.. कहाँ गुम थी रात बीती !

तेरी किताब के वो पन्नें फिर उभरे क्यूँ हैं..
वादा था तेरा की ना अब जाएगी उस गली..
देख अब लफ़्ज़ बनकर झाँक रहें हैं वो दर्द..
साथ हैं गुलाब की पंखुड़ियाँ जो थी दबी !

मैं पन्नें फाड़ने पर यक़ीन नहीं रखता..
इसलिए यादें तो सलामत रहेंगी सदा सभी..
पर जला दूँगा उन पंखुड़ियों को अब बस..
निशानियाँ दर्द ही देती हैं.. मिल जाए जो कभी !