कब तक ज़ुबाँ बंद रखोगे..कभी तो साँस उखड़ेगी
ज्वालामुखी भरा है मन में..चीख़ मारे चमड़ी उधड़ेगी !

इस जलते हुए शहर में .. अब मिलते नहीं इंसान
ग़रीबों को घर तो ना मिले.. पर बढ़ रहे शमशान
जुनून की हद के सर क़लम.. इसी बात पर ना हो जाए
मोक्ष धाम दिख रहे बस तुम्हें.. नहीं दिखते क़ब्रिस्तान

जो रंग़ नदी का लाल हुआ.. अब घर की चौखट छूती है
फिर कब पावन करने घर अपना.. बोलो गंगा उमड़ेगी
कब तक ज़ुबाँ बंद रखोगे..कभी तो साँस उखड़ेगी !

सबसे बड़े पाखण्डी हैं वो.. जो बन कर बैठें हैं सरताज
मुखौटों कि दुकान चली.. बाज़ार का नाम है “समाज”
ये अपने मुताबिक़ भारी करते.. पलड़ा इंसाफ़ तराज़ू का
ये तोला करते, बेचा करते.. जाती, धर्म, नौकरी, अनाज

तू देख पड़ोसी का घर जलता.. चुस्कियाँ चाय कि ले रहा
आँधी पर सवार इस आग से.. अब तेरी बगिया उजड़ेगी
कब तक ज़ुबाँ बंद रखोगे..कभी तो साँस उखड़ेगी !