याद तो मुझे भी नही किस बात से ख़फ़ा हूँ मैं..
कभी सनम से तो कभी सरकार से ख़फ़ा हूँ मैं

गर्मियों में बिजली कटने पर साँसों का सुलगना..
और इन सर्दियों में तेरी तकरार से ख़फ़ा हूँ मैं

रातों को नींद ना आने की परेशानी भी है..
और हफ़्ते के दिनों में, सोमवार से ख़फ़ा हूँ मैं

सड़कों पर गाड़ियों के धुएँ से दम का घुटना..
बग़ल में पान चबाते हवलदार से ख़फ़ा हूँ मैं

याद तो मुझे भी नही कितने दफ़ा मिले हम तुम..
बस तेरी यूँ भूलने की रफ़्तार से ख़फ़ा हूँ मैं

रास्ते से गुज़रती भी है तो नफ़रत का दुपट्टा औढे..
तेरी हल्की एक नज़र की दरकार से ख़फ़ा हूँ मैं

बात बात पर बस मुझ से बात ना करना..
तेरे इसी ख़ामोश हथियार से ख़फ़ा हूँ मैं