इसी आस पर आस टिकी है.. शायद ख़त नहीं पढ़ा उसने
तभी सुबह सुर्ख़ आखों का.. कोई बहाना नहीं गड़ा उसने

ऐ दिल तेज़ धड़कना छोड़.. ऐसा भी क्या कुफ़्र लिखा है
बस शामों-सुबह की बातें हैं.. जो हुआ वो ज़िक्र लिखा है
इन लफ़्ज़ों की जुर्रत को.. बस हर्फ़ों में बेफिक्र लिखा है
उसका कहीं भी नाम नहीं.. अपना ही तो सिर्फ़ लिखा है

मेरे वक़्त में वो पल कहाँ.. जिस पल नहीं लड़ा उसने
इसी आस पर आस टिकी है.. शायद ख़त नहीं पढ़ा उसने

ग़ौर से उसने देखा भी नहीं.. और मैं गुज़र गया अंगारों से
वो हैं संग दोस्त-सहेली के.. जाने कब उतरेंगे फ़राजों से
उसका पलटना हो कभी तो.. मेरी ख़ामोश आवाज़ों से
शायद फिर वो ख़त निकले.. मेरी मेज़ की दराजों से

ठिठोली अब भी करती है .. लो फिर आखें ली चढ़ा उसने
इसी आस पर आस टिकी है.. शायद ख़त नहीं पढ़ा उसने