ग्रीष्म, सावन, शरद और शीत लिखा था..
तब कहीं मन-भावन ये गीत लिखा था..
प्रकृति के जीवंत रंगो को शब्दों में रच..
दिन को कर निशा में व्यतीत लिखा था ।

वो बसंत की अटखेलियों में मगन..
भँवरों का पुष्पों के प्रति प्रीत लिखा था..
सूर्य ताप से बंजर निर्जल पटलों पर..
कर्मठ श्वेदों की बूँदों से जीत लिखा था ।

ज़र-ज़र पड़ी पृथ्वी की तृष्णा-तारों पर..
झर-झर गिरती वर्षा का संगीत लिखा था..
अलाव तापते, चाय की हर एक चुस्की में..
तुमको ही तो मैंने अपना मीत लिखा था ।