हर तरह के ज़ख़्म लिए फिरता हूँ..
कभी पैरहन-ऐ-जिस्म फाड़ के देख..
मेरी रूह आबाद है तेरी हर रहगुज़र में..
मेरे कमरे में मेरी लाश गाड़ के देख !

बदनाम भी बहुत हैं, बे-आबरू भी हैं..
तू मेरे अरमान ज़रा जान के देख..
मैं जो सोचता हूँ वो क्या सोचेगा कोई..
तू उस पर भी ख़्वाब मेरे अरमान के देख !

तेरे दीदार से ही इफ़्तार हुआ करती है..
तू दिन तो ज़रा मेरे रमज़ान के देख..
तू खेल में ही तोड़ दिल अपना, मिला संग मेरे..
फिर टुकड़े अपने दिल के पहचान के देख !

सबके अपने खुदा हैं और अपने ही रसूल..
तू पढ़ के आयतें मेरी क़ुरान के देख..
तेरे नाम से नमाज़ी हूँ नहीं तो काफ़िर..
इस कुफ़्र की सज़ा “उसके” फ़रमान में देख !

क़त्ल कर भी दोगे मेरा तो अफ़साना होगा..
खैरियत अपने अब्बा की दुकान की देख..
तुम्हें हँसने पर बोझ जो महसूस होता है..
ज़रा ग़ौर से परतें वो मेरे अहसान के देख !