अगर तुम दोस्त होते.. सहर यूँ बसर करते
कुछ अश्क़ जमा करते.. कुछ ग़म ग़लत करते !

वो क़िस्सों का पिटारा.. कहाँ कहाँ लिए फिरते
तुम्हें सामने बिठा कर.. शिकायतें फ़क़त करते !

वो बुझती बुझती शमा को.. रोशन और करते
चेहरे को कभी तकते.. बातों को ग़ज़ल करते !

चुप रात के सन्नाटों में.. जब भरे जाम छलकते
वो छोटी मोटी चीख़ों से.. नींदों में दख़ल करते !

बात कर उस शहर की.. सर्दियों में सफ़र तय रखते
फिर कुछ मजबूरियाँ गिना.. उसमें भी ख़लल करते !

सब गुफ़्तगू हो जाए.. और कुछ कहा ना जाए
फिर से वहीं सब बातें… आवाज़ें बदल करते !

फिर आए ये शब दुबारा.. कुछ ऐसी कसर रखते
अगर तुम दोस्त होते.. सहर यूँ बसर करते !