कभी सफ़र में साथ-साथ मंज़र भी ले चलो..
ख़ाली जेबों में समेट कर समंदर भी ले चलो..

सुना हो तो उनकी गलियों में सन्नाटा बहुत है..
चलो कभी उन रास्तों से तो बवंडर भी ले चलो..

चौखट पर रोज़ आओगे.. बस नज़रें मिलाओगे..
कभी तो हाथ थाम कर अंदर भी ले चलो..

खटखटाने से दरवाज़े नहीं खुलते आजकल..
निकलो कभी घर से तो लंगर भी ले चलो..

ऐतराज़ ना हो किसी को तेरी तंगदिली पर..
अपनी पीठ पर गड़े सारे ख़ंजर भी ले चलो..

इतनी ख़ुशनुमा ज़िंदगी भी अच्छी नहीं शायर..
क़ाफ़िले में कोई तो सितमग़र भी ले चलो..

कुछ तल्ख़ी सी निगाहों से कुछ सवाल आएँगे..
इस काफ़िर के जनाज़े में पैग़म्बर भी ले चलो..