दुश्मनों से नहीं साज़िशों से नफ़रत है..
मुझे दोस्तों की रंजिशों से नफ़रत है..
दुआ भी करो तो सब यहाँ ऐसे करो..
बंदगी में भी इन बंदिशो से नफ़रत है ।

सैलाब को कब तक साहिल पर रोकोगे..
अख़लाक से कैसे ज़ालिम को रोकोगे..
जो तक़रीर करते हैं ऊँची परवाज़ों की..
उनके घर में रखे पिंजरों से नफ़रत है ।

कभी मोहल्ले की सारी छतें हमारी थीं..
सब लोग अपने थे.. वाह क्या रवानी थी..
अब दस्तकों पर भी दरवाज़े नहीं खुलते..
बढ़ती उम्र में सिमटते दायरों से नफ़रत है ।

मुफ़लसी के मारे हालात की बात करते हो..
खोखले जज़्बातों की औक़ात की बात करते हो..
बातें गुलों-गुलज़ार की भी किया करो शायर..
दुनिया को तुम जैसे शायरों से नफ़रत है ।