आशाओं का भार उठा सकोगे ?
क्या चल पाओगे जब लदी होंगी पीठ पर..
बेताल सी उम्मीदें.. परायों की.. अपनों की

क्या ख़ुद बन कर भी रह पाओगे ?
या फिर बाँटते फिरोगे वक़्त जाने-अनजानो में..
इज़्ज़त रखने.. सम्मानों की.. रस्मों की

भूल पाओगे जब पहचान होगी ?
असली नक़ली रिश्तों की और दर्द भी होगा..
सुना है उम्र बहुत होती है इन ज़ख़्मों की

जान कर माफ़ कर पाओगे ख़ुद को ?
कि राहों पर बोझ उठाए क़दम चल रहे हैं कुचलते..
साँसे किसी और के मरे-अधमरे सपनों की