उन आह में भी क्या बात थी..
जब छतों पर चलते नंगे पाँव जलते थे..
गले में हाथ डाले यारों के..
अपने मोहल्ले की गली-गली भटकते थे..
सर्दियों में रेल बन धुआँ छुड़ाते..
और गर्मियों में पसीने की बूँद सा टपकते थे..
हर शाम खेल में लगती चोटें..
ख़ुद लथपथ हो उन पर भी मिट्टी रगड़ते थे..
रात को ग़ुस्से में सो जाते आकर..
सुबह याद नहीं शाम जिस बात पर झगड़ते थे..
वो एक रुपये की आइस-क्रीम..
दो रुपये की कॉमिक्स पर पैसे खर्च होते थे..
जहाँ रात दस बजे की फ़िल्म में..
ग्यारह बजे टी॰ वी॰ बंद हो जाने पर रोते थे..
बारिश में काग़ज़ की नाव चलाते..
कीचड़ में घर बनाते शायद ये याद ही बोते थे..
वो दिन याद हो तुम्हें अगर तो “शायर”..
तुम चद्दर तान कर कभी दोपहर में भी सोते थे ।