सन्नाटे कि आवाज़ में खोज कर देखो..
चरमराया हुआ वजूद मरा तो नहीं..

टटोलना ठीक से के अंधेरा बहुत है यहाँ..
सूखा सा होगा, भरा-भरा तो नहीं..

बचपन की चहक तो अब क्या ही होगी..
वो जवानी का नशा भी उतरा तो नहीं ?

जज़्बात की क़ीमत क्या लगेगी बाज़ार में?
दबा-दबा सा था कभी उफ़ना तो नहीं..

ज़माने पहले, दोस्तों संग देखी थी सूरत..
अब सड़ सा गया है, कुछ ख़तरा तो नहीं?

ज़मीर बेच कर जो मिली थी साँसे शायर..
पिला दो, के शुक्र है अभी बिखरा तो नहीं..