ना शिकायतें ख़त्म होंगी..ना उम्मीदें ही ख़त्म होंगी..
तेरे असरार-ए-मोहब्बत में बस नींदें ही ख़त्म होंगी

सितम के सड़ते ढेर से कुछ आवाज़ों की सुगबुगाहट..
इस सर्द रात के सन्नाटे में ये चीख़ें भी ख़त्म होंगी

दैर-ओ-हरम से आते तो कुछ मैखानों से निकलते..
झरोखों से ताके नज़रें की हम कनीज़ें ही ख़त्म होंगी

इस बार ये इंक़लाब क्या लिखेगा मुस्तकबिल भी ?
या फिर बस बुत ही टूटेंगे.. यूँ तकरीरें ही ख़त्म होंगी

आँधियों की नीयत लाओ के यूँ फूँकों से ऐ शायर
ये दीवार क्या गिरेगी.. क्या लकीरें ही ख़त्म होंगी