कुछ ने अपना समझा कुछ ने बेगाना..
तवायफ़ सा है ये शहर
रोज़ उठना, दफ़्तर जाना, आके सो जाना..
क़वायद सा है ये शहर
थोड़े में जीना..थोड़े में मर जाना..
किफ़ायत सा है ये शहर
दिन में झुलसाना.. रात में सहलाना..
रियायत सा है ये शहर
लाखों आते हैं यहाँ.. लाखों परेशां भी है..
हिदायत सा है ये शहर
कूड़े के ढेर में सहमी.. आसमां छूती इमारतें..
ख़ूबसूरत सा है ये शहर
रंगीनियाँ भी हैं.. दरिया का किनारा भी..
शरारत सा है ये शहर
धड़कने बढ़ाता भी है.. तड़पाता भी है..
मोहब्बत सा है ये शहर
जाएँ तो जाएँ कहाँ ये साँसे छोड़ शायर…
ज़रूरत सा है ये शहर

… to my love for the city of MUMBAI ❤