पसीने की बूँदों पर…
हवा का झोंका सा हो तुम
जिस पर जाँ निकल जाए…
लफ़्ज़ वो रोका सा हो तुम

रोज़ की आवाज़ों से…
फ़ुर्सत का मौक़ा सा हो तुम
तरकारी में नमक और…
दाल में छोंका सा हो तुम

रात की थाली में जैसे…
चाँद परोसा सा हो तुम
घुटते कमरे की दीवार पर…
एक झरोखा सा हो तुम

बंद आखों से ही दिखोगे…
घाटे का सौदा सा हो तुम
पलकें उठने से पहले ‘शायर’…
कह दो के धोखा सा हो तुम