यूँ ही ज़रा तेरी बातें गूँजे कभी कानों में..
याद हर हर्फ़ आए जो कहा था बहानों में

समझा तो तूने भी होगा यूँ चाँद पर बैठे..
की मैं ही अजीब सा हूँ तेरे सब दीवानों में

रब ने पूछी जो मुझसे आख़िरी ख़्वाहिश..
नाम तेरा ही लिखा मैंने हर ज़ुबानों में

मिलके गुमनाम हो जाना ज़्यादा अच्छा है..
या ना मिल के सिमट जाना अफ़सानों में

बेड़ियाँ काट सकते हो तुम पर काटोगे नहीं..
कि तेरे अपने क्या मुँह दिखाएँगे बेगानों में

मैं शेर-ओ-हुस्न में बात-ए-इंक़लाब कहता हूँ
मेरी तस्वीर ना रखना घरों के रोशनदानों में

ये ग़ज़ल फिर कब कहाँ सुनोगे ‘शायर’
बस गुनगुना लिया करना तुम तरानों में