यक़ीं आएगा तुझे कभी यक़ीं तो कर
मेरी वफ़ा देख आखों में नमीं तो कर

रूह एक है तो भला जिस्म दो क्यूँ ?
हाथ थाम मेरा खुदी को हमीं तो कर

पीर परेशान हैं के क्या बला है चढी ?
कहना मान अदाओं में कमी तो कर

ज़ुबाँ खुली तो तेरी इबादत निकली
लब चूम भी ले मेरे मुझे नबी तो कर

तू कह दे तो ये दीदार आख़िरी होगा
बस आँचल से बुहार के ज़मीं तो कर

आए तुम भी मज़ार-ऐ-आशिक़ शायर
खुदा मिलेंगे दहलीज़ पर जबीं तो कर