हाँ ठंडा हो गया है ख़ून..
मतलब ये तो नहीं, कभी उबला ही नहीं ?
हाँ बेसुध हूँ मैं यहीं-कहीं..
मतलब ये तो नहीं, कभी संभला ही नहीं ?

तुमको शिकायत थी मुझसे..
कि मैं उलझा-उलझा सा रहता हूँ
क्या पूछा है कभी ख़ुद से भी ?
क्यूँ मैं उलझा-उलझा सा रहता हूँ ?

तुम भी तो आई थी मेरे..
जीवन में बन कर एक लहर सी
तुम से जो मिला मैं, मैं बनकर..
वो शब कटी राह में सहर की

सब कहते की मैं..
कुछ ख़फ़ा-ख़फ़ा सा रहता हूँ
मेरे जज़्बातों से पूछो..
कितना दबा-दबा सा रहता हूँ

कब चाहा मैंने शीशमहल ?
बस एक चद्दर हो, एक बिछौना हो
और सर हो उस कंधे पर..
जिस पर फफक-फफक कर रोना हो ।