खड़ा बीच सभा वह क्या जाने
क्या शिष्टाचार है,
असभ्य शब्दों के पाषाण फेंकता
लिए अहंकार है,
आत्म-मुग्ध सा वह आग लगाता
किए हाहाकार है,
मलिन विचारों का गरल उगलता
सर्प विकराल है,
वह हर युग का शिशुपाल है।

वह चुप बैठा है पर सुन रहा
वह ह्रदय-विशाल है,
घूँट-घूँट विष की बूँद पी रहा
वह महाकाल है,
संयम बाँधे जब तक क्षमता है
सह रहा प्रहार है,
वसुधैव कुटुंबकम् की प्रज्वलित किए
वह मशाल है,
वह भारत-वर्ष का नंदलाल है।

क्या सौ पर रुकेगा शिशुपाल इस बार, यह प्रश्न हो!
या इस युग में फिर सुदर्शन चलाना होगा कृष्ण को।