जिसे था अभी छुवाँ-छुवाँ
वो इस घड़ी धुवाँ-धुवाँ

एक ख़्वाब भूल रहा हूँ मैं
और आँखों में नींदे कहाँ

खिड़कियाँ खोल देखूँ तो
कैसे जी रहा है जहाँ ?

अंधेरी होगी और भी
ये रात अभी है जवाँ

इस बर्फ़ सी खामोशी में
क्या है लहूँ रवाँ-रवाँ ?

कहना उससे तू याद है
मिले अगर यहाँ-वहाँ

हर बात अधूरी है ‘शायर’
फिर भी पूरी है दास्ताँ