मुझे यक़ीं करने दो, अभी भी वक्त है
शहर में सुलझा हुआ हर एक शक्स है

बारिशों में सीलती दीवारें हैं तो क्या?
इस घर की बुनियाद अभी भी सख़्त है

अनजाने ही आज ग़म से नज़र मिली
आँखों में उसकी ख़ुशी का अक्स है

दो पैसे की रोटी ली, दो का खिलौना
उसके दर पे अब महफ़िल है, रक़्स है

नाराज़ बैठे हैं वो मेरी एक छलाँग से
मेरी परवाज़ से ऊँचा जिनका तख़्त है

क्या सोचना कौन आया गया ‘शायर’
सबसे अकेला वो नुक्कड़ का दरख़्त है