एक दरिया है मुझमें
एक रूह प्यासी भी,
सहर की ताज़गी
शब की उदासी भी,
लोगों का शोर
तेरी खामोशी भी,
बोझ मीलों का
बे-शिकन पेशानी भी,
हर बात पर यक़ीं
और हैरानी भी,
खुद से नाराज़गी
और परेशानी भी,
चाहत-ऐ-इंक़लाब
आदत-ऐ-ग़ुलामी भी,
ठंडी मौत की घुटन
ख़ुशनुमा ज़िंदगानी भी,

जो चेहरा देखती हो तुम
कल वैसा पाओगी भी?
ये जान कर सब कुछ,
लौट कर आओगी भी?