क्षितिज हो तुम…
दूर कहीं, कभी तो, मिलती हुई मुझमें
सागर के विस्तार सी समाती
पिघलते हुए सूरज सी तुम्हारी शर्म
दे रही ढलती शाम को लाली

क्षितिज हो तुम…
जानता हूँ जहाँ तक दृष्टि जा रही है
वहाँ भी नहीं तुम मिलोगी
लाँघ लूँ मैं यदि आधा सागर भी
कहीं दूर ही संग दिखोगी

क्षितिज हो तुम..
तेरे ना होने पर भी होने का आकर्षण
तट पर खींच लाता है मुझे
जो प्रत्यक्ष हो उसे छूना ज़रूरी तो नहीं
फिर भी क्यूँ पाना है तुझे?

क्यूँकि… क्षितिज हो तुम।