जिस राह से रोज़ गुज़रते हो..एक रस्ता वहाँ से कटता है
जहाँ आज भी घर की चिमनी से.. चूल्हे का धुऑँ उड़ता है !

वो गठरी काटी लकड़ियों की.. बस बाँधी हुई है आधी सी
वो घाँस के सूखे तिनकों से भी..तो आँगन बिखरा रहता है !

ये बात है उन पहाड़ों की.. जहाँ रस्ते ऊँचे नीचे हैं
उन पथरीली राहों पर भी कैसे… बचपन भागा करता है !

वो पेड़ पर चड़ने गिरने में… कब दोपहर कब शाम हुई
फिर दौड़ के लाते गगरी से.. पानी भी ख़ूब छलकता है !

उन शांत सूहनी रातों मे..अँधेरा बहुत ही गहरा है
तारों की भी जगमग है.. चाँद भी तन के अकड़ता है !

नींद भी गहरी आती है.. जब रात की रानी महकी हो
और हिलना चीड़ के पेंड़ों का.. हल्के से पंखा झलता है !

देखने को समय से परे…आखें भींचे, खड़ा हूँ वहीं
जिस राह से रोज़ गुज़रता हूँ.. वो रस्ता जहाँ से कटता है !