हर लहर लौट गई टकरा कर किनारों से
वो फिर बातें करने लगा रात सितारों से

साहिल पर नंगे पाँव संग क्या चलती वो?
बस पूछा नहीं उससे पर पूछा हज़ारों से

इन चट्टानों के पीछे सतरंगी इंद्रधनुष है
सुनकर झाँकता रहा दिन भर दरारों से

नींद ओढ़ के सोता है वो जब भी सोता
पर ना पलकें ही झपकता है शरारों से

शहर में घूमता बस वो दीवाना ही मिलेगा
बाक़ी लोग जी रहें हैं अपनी मज़ारों से

सबका अपना सच है सबका अपना रब
कोई तो चुनवा देगा ही उसको दीवारों से